वर्त्तमान समय में बदलता पर्यावरण
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समय के साथ न जाने कितना कुछ बदल गया! आज पर्यावरण के चर्चा से न जाने क्यों मन विचलित हो जाता है? समय के साथ-साथ लोग भी बदल रहे है.आज आपको जगह-जगह पर कूड़ा-कचरा का ढ़ेर देखने को मिल जाता है. इसका सबसे बड़ा उदहारण है कि जब आप किसी भी शहर में प्रवेश करते है तो आपको उस शहर से पहले इन कूड़े-कचरे के ढ़ेर आपका स्वागत करते है.
आज मानव ने अपनी सोच ही परिवार तक सीमित रखी है.हम दो (पति-पत्नी)और हमारे दो बच्चे। उन्हें समाज की सोच से क्या लेना-देना!अब पर्यावरण के बिगड़ते समन्वय के कारण आनेवाले कुछ समय में समूचे सजीव जंतुओं को काफ़ी परेशानियों का सामने करना पड़ सकता है.आज हर तरफ गंदगी है. एक समय में लोग तलाबों, पोखर का पानी ग्रहण किया करते थे. आज इनका पानी पीना तो दूर नहाने के लिए भी स्वच्छ नहीं बचा है.
आज पेड़-पौधे बेरहमी से काटे जा रहे है.आज कोरोना महामारी ने लोगों को ऑक्सीजन का महत्त्व बता दिया। कई प्रदेशों में इतनी बुरी हालत थी कि लकड़ी तो वहां मिल भी नहीं रही थी, वहां की सरकार ने ईख के चेपुवों पर लाश जलाने की अनुमति दी. असमय बारिश ने हर तरफ ऐसे हालात पैदा कर रखा है की रेगिस्तान में भी बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है.लोग बहुत सारे बेघर हो गए.
रंग बिरंगे पक्षियों और जानवरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. न जाने कितने विलुप्त हो गए।प्लास्टिक का उपयोग न करने पर सरकार और प्रसाशन ने बहुत सरे उपाय किये, लेकिन उनका प्रयास असफल रहा. लोग जब तक अपने में बदलाव लेन की कोशिश नहीं करेंगे तब तक कुछ नहीं बदलेगा।
इन सबसे दूर एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसका मुख्य उद्देश्य वृक्षों को बचाना था. उन्होंने 'चिपको आंदोलन' की शुरुवात की थी. प्रत्येक पेड़ से कोई-न- कोई व्यक्ति चिका होता था और जब भी कोई उस पेड़ को काटने जाता था, तो वह व्यक्ति उस पेड़ काटने वाले से बोलता था पहले मुझे काटो फिर इस पेड़ को. तब जाकर उस पेड़ की जान बचती थी।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक पेड़ अवश्य लगानी चाहिए.
Written By-
Ritesh Raj
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